मुसलमाँ हूँ मैं, मुस्लिम होने की पहचान से जाऊँ,
जो आतंकवाद का दूँ साथ तो ईमान से जाऊँ..॥
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सिखाता कब है ये मज़हब, मिलेगी इस तरह जन्नत,
वो अपनी जान से जाये मैं अपनी जान से जाऊँ...॥
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इजाज़त ही नहीं नाहक़ किसी का ख़ूँ बहाने की,
भला ऐसा अमल करके मैं क्यों क़ुरआन से जाऊँ..॥
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पड़ोसी ग़ैर मुस्लिम है मगर वो भाई जैसा है,
तो मैं क्यों छोड़कर फिर ऐसे हिंदुस्तान से जाऊँ..॥
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मेरे हिस्से की रोटी भी खिला दूँगा उसी को मैं,
न होगा मुझसे मैं मुँह फेरकर, मेहमान से जाऊँ..॥
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मैं जिस महफ़िल में आया हूँ यही अरमान है मेरा,
मैं जितनी शान से आया था उतनी शान से जाऊँ..॥
Friday, 2 September 2016
Maharban ansari
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