Monday, 19 September 2016

बच्चे ने एप्पल आई पैड के लिए जमा किये 20 डॉलर मस्जिद को दिए थे , अब मुस्लिम समुदाय ने दी प्रतिक्रिया


बच्चे ने एप्पल आई पैड के लिए जमा किये 20 डॉलर मस्जिद को दिए थे , अब मुस्लिम समुदाय ने दी प्रतिक्रिया

 

बात कुछ हफ़्तों पहले की है जब 7 वर्ष के जैक स्वानसन ने सुना था कि टेक्सास में स्थित फ्लूग्रविल्ले के इस्लामिक सेण्टर में कुछ अतिवादियों ने...
बात कुछ हफ़्तों पहले की है जब 7 वर्ष के जैक स्वानसन ने सुना था कि टेक्सास में स्थित फ्लूग्रविल्ले के इस्लामिक सेण्टर में कुछ अतिवादियों ने तोड़ फोड़ की है तो इस 7 वर्ष के बच्चे ने इंसानियत को सर्वोपरि रखकर आई पैड के लिए अपने जमा किये हुए 20 डॉलर मस्जिद को दान कर दिए थे।

अतिवादियों ने इस्लामी धर्मग्रन्थ क़ुरआन मजीद की बेअदबी की थी और मस्जिद में तोड़फोड़ की थी

जैक की माँ ने एबीसी न्यूज़ को बताया था कि उनके बेटे ने यह सुनने के बाद अपनी गुल्लक से सारे डॉलर , जो 20 डॉलर थे, निकाल कर मस्जिद को दान कर दिए थे।

मस्जिद के एक सदस्य फैसल नईम ने बताया था कि जैक के इस कदम को देख कर मस्जिद के सभी सदस्य प्रसन्न और भावुक हो गए थे।

उन्होंने कहा :

" जैक के 20 डॉलर हमारे लिए 20 ,मिलियन डॉलर से भी ज़्यादा मूल्य के थे क्योकि उन्होंने हमे एक आशा दी थी। जैक के साथ हम सबके बच्चे पल बढ़ रहे है यदि जैक जैसे और बच्चे इस दुनिया में हो तो ,वह भविष्य के लिए एक आशा बन सकते है"


लेकिन बात यही खत्म नहीं हुई , जब स्थानीय मुस्लिम समुदाय को जैक के बारे में पता चला तो उन्होंने जैक को एक सरप्राइज गिफ्ट देने की सोची

स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने जैक को धन्यवाद स्वरुप एप्पल आई पैड भेंट कर दिया जिसको लेने के लिए जैक पैसे जमा कर रहा था।

साथ में यह सन्देश भी दिया

"आदरणीय जैक,
आप एप्पल आई पैड लेने के लिए डॉलर जमा कर रहे थे लेकिन एक स्थानीय मस्जिद में तोड़फोड़ की वारदात हुई जिसमे आपने अपने वही 20 डॉलर दान कर दिए थे।  आपकी दानशीलता, उदारता और कोमल हृदय के लिए......कृपया सधन्यवाद अपना एप्पल आई पैड ग्रहण करे "

सप्रेम 
अमेरिकी मुस्लिम समुदाय  :) " 
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वाह , क्या बात है। शानदार ज़िंदाबाद जबरदस्त। बालक खुश कर दित्ता

Thursday, 15 September 2016

इंडियन मीडिया और मुसलमान

इंडियन मीडिया और मुसलमान!!!******    

शाहबुद्दीन तो सिर्फ एक बहाना है असली मुद्दा तो मुस्लिमो से नफ़रत को देश में फैलाना है#####

पिछले कुछ दिनों से मीडिया शाहबुद्दीन की रिहाई को लेकर देश में ऐसा मौहल बना रही है कि देश के हिन्दुओ को लगे की शहाबुद्दीन कोई बहुत बड़ा आतंकवादी है और उसके रिहा होने से हिन्दुओ की जान को खतरा है।

जबकि  शाहबुद्दीन पर भी वही आरोप है जैसे उत्तर प्रदेश में राजा भैया, डी पी यादव, ब्रजभूषण सिंह, धनअंजय सिंह, हरी शंकर तिवारी, बिहार में सूरज भान, मुन्ना शुक्ला, अनंत सिंह, प्रभुनाथ सिंह, पप्पू यादव और भी कितने अपराधी नेताओं पे है। बल्कि इनमे से ज़्यादातर पे शाहबुद्दीन दे कही ज़्यादा गंभीर आरोप है और वो सभी पार्टीयो के सांसद और विधायक है। जब वो संगीन अपराध करते है और खुलेआम कानून का मज़ाक बनाते है तब मीडिया को उनमे सिर्फ एक अपराधी दिखता है लेकिन जब यही नाम कोई शाहबुद्दीन, मुख़्तार होता तो मीडिया उसे ऐसा बना कर पेश करती है जैसे वो दुनिया का बहुत बड़ा आतंकवादी है और देश में दूसरे धर्म के लोगो को ही उससे खतरा है। ताकि लोगो को बताया जा सके की सिर्फ मुस्लिम ही अपराध करता है बाकी धर्म के अपराधी तो मजबूरी में ऐसे है।
संघी मीडिया को मुस्लिम अपराधी की छोटी से छोटी बात तो बहुत बड़ी लगती है लेकिन जब अपराधी किसी और धर्म का हो (जैसे छोटा राजन जैसा खूंखार अपराधी जिसे मीडिया ने राष्टवादी डॉन कहा) तो मीडिया उसके मजबूरी में अपराधी बनने की कहानी बनाती है।

वही देश में मुसलमानो का नरसंघार करने वालो को मीडिया ने देश का हीरो बना कर पेश किया और राष्ट्रभक्ति का नाम देकर कितने ही आतंकवादियो को सत्ता के ऊंचे मुकाम तक पहुचाया।
मोदी की मंत्री माया कोडनानी ने बेक़सूर मुसलमानो को आग में जलवाया और बाबू बजरंगी तो मुस्लिम बच्चो को मार कर खुद को शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसा समझ रहा था उन जैसे हज़ारो आतंकवादियो को बीजेपी और आरएसएस खुलकर समर्थन करते है और अदालतों में उन्हें पूरी सुविधा दिलाते है। तब ये मीडिया को क्या हो जाता है।अमित शाह को जब अदालत से तड़ीपार कर गुजरात से में नहीं घुसने का फरमान होता तब अदालत गलत हो जाती है और वही जब उन्ही अदालतों से अपने हिसाब फैसला दिला कर अपराधी को पार्टी का प्रमुख बना दिया जाता है तब इस पर मीडिया में उस पर कोई चर्चा नहीं होती।

मुज़फ्फरनगर में फर्जी विडियो दिखा कर दंगा करने वाले सोम, राणा, बालियान, साध्वी प्राची मीडिया की नज़र में राष्ट्रवादी है। बम ब्लास्ट के आरोपी साध्वी प्रज्ञा, कर्नल परोहित, स्वामी असीमानंद और संघ से जुड़े कितने ही लोग जो प्रधानमंत्री मोदी, ग्रहमंत्री राजनाथ जैसे बड़े नेताओं के करीबी है उनको मीडिया का समर्थन क्यों है।
शाहबुद्दीन के मामले को इतना जोरशोर से उठा कर ये भगवा मीडिया हरियाणा के इतने बड़े कांड को छुपा गया।

आज देश में सरकार की कोई भी नीति का विरोध करना देशद्रोह बन गया है और यह सब इसी संघी मीडिया की वजह से है। जो वही खबर दिखाता है जो नागपुर के इसके आकाओ की तरफ से कही जाती है।
आज देश की हालत ऐसी हो गई है कि जिस पे जुल्म होता है उसी को मीडिया अपराधी बना कर दिखाता है। चाहे दादरी के अख़लाक़ के परिवार के साथ मीडिया का बर्ताव हो या हरियाणा के मज़लूम परिवार के साथ या मुज़फ्फरनगर के दंगा पीड़ित लोगों के साथ इन सारे मामलों में मीडिया ने पीड़ित मुस्लिमो को ही गुनाहगार साबित करने की कोशिश की।

आतंकवाद के नाम पे फ़र्ज़ी मुकदमो में जब मुस्लिम लड़को को संघी खुफिया एजेंसी गिरफ्तार करती है तब यह न्यूज़ चैनल 24 घंटे झूठी कहानियां दिखा कर गिरफ्तार लोगों के परिवारों और पूरी मुस्लिम क़ौम पर आतंकवादी होने का ठप्पा लगाती है और जब इन्ही बेक़सूर लोगो के कई साल बर्बाद करके उन्हें जब बरी किया जाता है तब मीडिया में उस पर कोई चर्चा नहीं होती।

मीडिया का काम होता है किसी भी खबर को लोगो तक पहुचाना लेकिन देश के ज़्यादातर मीडिया घराने किसी ना किसी बड़े उधोगपतियों के है जो सरकार और संघ के इशारों पे समाज में नफरत फैला कर संघ के नफरत के एजेंडे को पूरा कर रहे है। जिससे देश में हिन्दु-मुस्लिम के बीच में दूरी बढ़ती रहे और 2014 के चुनाव की तरह 2019 में भी इनकी सरकार बने। मोदी ने देश से जो वादे किए थे वो तो भुला दिए है और महंगाई को भी नहीं रोक पाए है अब सिर्फ समाज में नफरत फैला कर ही चुनाव जीता जा सकता है जिसको यह दलाल और भांड मीडिया के माध्यम से अंजाम दे रहे है।

नोट:- मेरी पोस्ट शाहबुद्दीन या किसी और के सपोर्ट में नहीं है बल्कि मीडिया का असली चेहरा लोगो के सामने लाने की कोशिश है।जो मुस्लिमो का नाम आते ही भूखे भेड़िया की तरह उन पर टूट पड़ता है।بزم اردو فاروق ایوب

Monday, 12 September 2016

Urdu shayri

दोनों आलम में तेरे हुकुम को चलते देखा
बिन तेरे हुकुम के पत्ता भी हिलता ना देखा

बदला दुनिया का चलन और हर एक से बदली
हमने कुरऑन को अब तक ना  बदलते देखा

कौन कहता है कि दुश्मन जीने नहीं देता
गोद फिरौन की और मूसा को पलते  हुए देखा

ए उमर आप तो क्या है हमारे नबी के आगे
अच्छे-अच्छों को इरादों को बदलते देखा

सरकारे मदीना ने जिन को किया है रोशन
उन चरागों को हवा में भी जलते देखा

क्या अजब शान अल्लाह अली की देखो
डूबे सूरज को इशारों पर पलटते हुए देखा

लाख चाहा सद्दाद ने कजा से बचना
पर सितम वक्ते  कजा हमने न टलते देखा

Thursday, 8 September 2016

यह कहां आ गए हम

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

ये कहाँ आ गए हम ?

            ये  कहाँ आ गए हम ?

“फ़रिश्ता बनने की  चाहत न करें तो बेहतर है , इन्सान हैं  इन्सान ही बन जाये यही क्या कम है  !”


तारीख़ :   25 अगस्त 2016
स्थान   :   ओड़िशा के कालाहांडी जिले का सरकारी अस्पताल
अमंग देवी  टी बी के इलाज के दौरान जीवन से अपनी जंग हार जाती हैं । चूँकि वे एक आदिवासी, नाम , ’ दाना माँझी ' की पत्नी हैं  , एक गुमनाम मौत उन्हें गले लगाती है।

 लेकिन हमारी सभ्यता की खोखली तरक्की  , राज्य सरकारों की कागज़ी योजनाओं ,पढ़े लिखे सफेदपोशों से भरे समाज की पोल खोलती  इस देश में मानवता के पतन की कहानी कहती एक तस्वीर ने उस गुमनाम मौत को अखबारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियाँ बना दिया  ।
जो जज्बात एक  इंसान की मौत नहीं जगा पाई वो जज्बात एक तस्वीर जगा गई। पूरे देश में हर अखबार में  हर चैनल में  सोशल मीडिया की हर दूसरी पोस्ट में अमंग देवी को अपनी मौत के बाद जगह मिली लेकिन उनके मृत शरीर को एम्बुलेंस में जगह नहीं मिल पाई ।
पैसे न होने के कारण तमाम मिन्नतों के बावजूद जब अस्पताल प्रबंधन ने शव वाहिका उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई तो लाचार दाना माँझी ने अपनी पत्नी के मृत शरीर को कन्धे पर लाद कर अपनी 12 वर्ष की रोती हुई बेटी के साथ वहाँ से 60 कि. मी. दूर अपने गाँव मेलघारा तक पैदल ही चलना शुरू कर दिया और करीब10 कि.मी. तक चलने के बाद कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से और खबर मीडिया में आ जाने के बाद उन्हें  एक एम्बुलेंस नसीब हुई।
पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर जिला कलेक्टर का कहना था कि माँझी ने वाहन का इंतजार ही नहीं किया। वहीं 'द टेलीग्राफ ' का कहना है कि एक नई एम्बुलेंस अस्पताल में ही खड़ी होने के बावजूद सिर्फ इसलिए नहीं दी गई क्योंकि किसी ' वी आई पी ' के द्वारा उसका उद्घाटन नहीं हुआ था।इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि ऐसी ही स्थितियों के लिए नवीन पटनायक की सरकार द्वारा फरवरी माह में  'महापरायण ' योजना की शुरुआत की गई थी  । इस योजना के तहत शव को सरकारी अस्पताल से मृतक के घर तक पहुंचाने के लिए मुफ्त में परिवहन सुविधा दी जाती है।बावजूद इसके एक गरीब पति ' पैसे के अभाव में ' अपनी पत्नी के शव को 60 कि . मी. तक पैदल ले जाने के लिए मजबूर है  ।
  अगर परिस्थिति का विश्लेषण किया जाए तो निष्कर्ष यह निकलेगा कि बात दाना माँझी के पास धन के अभाव की नहीं है बल्कि बात उस अस्पताल प्रबंधन के पास मानवीय संवेदनाओं एवं मूल्यों के अभाव की है  । बात  एक गरीब आदिवासी की नहीं है बात उस तथाकथित सभ्य समाज की है जिसमें एक बेजान एम्बुलेंस को किसी वी आई पी के इंतजार में खड़ा रखना अधिक महत्वपूर्ण लगता है बनिस्पत किसी जरूरतमंद के उपयोग में लाने के।बात उस संस्कृति के ह्रास की है जिस संस्कृति ने भक्त के प्रबल प्रेम के वश में प्रभु को नियम बदलते देखा है, लेकिन उस देश में सरकारी अफसर किसी मनुष्य के कष्ट में भी नियम नहीं बदल पाते । यह कैसा विकास है जिसके बोझ तले इंसानियत मर रही है ?  जो सरकारें अपने आप को गरीबी हटाने और गरीबों के हक के लिए काम करने का दावा करती हैं उन्हीं के शासन में उनके अफसरों द्वारा अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है।
किसी की  आँख का आंसू 


मेरी आँखों में आ छलके;
किसी की साँस थमते देख
मेरा दिल चले   थम  के;
किसी के जख्म की टीसों पे ;
मेरी रूह तड़प जाये;
किसी के पैर के छालों से
मेरी आह निकल जाये;
प्रभु ऐसे  ही भावो से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे  इंसानियत का दरिया तुम कर दो.
किसी का खून बहता देख
मेरा खून जम जाये;
किसी की चीख पर मेरे
कदम उस ओर बढ़ जाये;
किसी को देख कर भूखा
निवाला न निगल पाऊँ;
किसी मजबूर के हाथों की
मैं लाठी ही बन जाऊं;
प्रभु ऐसे ही भावों से मेरे इस दिल को तुम भर दो;
मैं कतरा हूँ मुझे इंसानियत का दरिया तुम कर दो  ( डॉ  शिखा कौशिक) 
बात हमारे देश के एक पिछड़े राज्य ओड़िशा के एक आदीवासी जिले की अथवा सरकार या उसके कर्मचारियों की नहीं है बात तो पूरे देश की है हमारे समाज की है हम सभी की है  ।
16 अगस्त 2016  : भारत की राजधानी दिल्ली 


एक व्यस्त बाजार  , दिन के समय एक युवक सड़क से पैदल जा रहा था और वह अपनी सही लेन में था। पीछे से आने वाले एक लोडिंग औटो की टक्कर से वह युवक गिर जाता है, औटा वाला रुकता है  औटो से बाहर निकल कर अपने औटो को टूट फूट के लिए चेक करके बिना एक बार भी उसकी टक्कर से घायल व्यक्ति को देखे निकल जाता है  । सी सी टीवी फुटेज अत्यंत निराशाजनक है क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक पल रुक घायल की मदद करने के बजाय उसे देखकर सीधे आगे निकलते जाते हैं।
कहाँ जा रहे हैं सब ? कहाँ जाना है ? किस दौड़ में हिस्सा  ले रहे हैं  ? क्या जीतना चाहते हैं सब ? क्यों एक पल ठहरते नहीं हैं  ? क्यों जरा रुक कर एक दूसरे की तरफ प्यार से देखने का समय नहीं है, क्यों एक दूसरे की परवाह नहीं कर पाते  ,क्यों एक दूसरे के दुख दर्द के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते , क्यों दूर से देख कर दर्द महसूस नहीं कर पाते ? क्यों हम इतने कठोर हो गए हैं कि हमें केवल अपनी चोट  ही तकलीफ देती है  ? क्या हम सभी भावनाशून्य मशीनों में तो तब्दील नहीं हो रहे ?

विकास और तरक्की की अंधी दौड़ में हम समय से आगे निकलने की चाह में मानव भी नहीं रह पाए  । बुद्धि का इतना विकास हो गया कि भावनाएं पीछे रह गईं । भावनाएं ही तो मानव को पशु से भिन्न करती हैं  । जिस विकास और तरक्की की दौड़ में मानवता पीछे छूट जाए, भावनाएँ मृतप्राय हो जांए ,मानव पशु समान भावना शून्य हो जाए उस विकास पर हम सभी को आत्ममंथन करने का समय आ गया है  ।

डॉ नीलम महेंद्र 

Sunday, 4 September 2016

फिरओन की लाश और डाक्‍टर मोरिस बोकाय की रिसर्च Hindi

फिरओन की लाश और डाक्‍टर मोरिस बोकाय की रिसर्च Hindi

फिरओन  "Pharao"   नाम नहीं बल्कि मिस्र के बादशाहों की उपाधि common title है  ऐसे लगभग 14 फिरआेन अर्थात मिस्र के बादशाहों के नाम मिलते हैं । रामेसेस महानके उन्नीसवे वंश का तीसरा फिरआन "Pharao"(Ramesses II)  की लाश पर फ्रांस के  इसाई डाक्‍टर मोरिस बोकाय की  रिसर्च के कारण लगातार चर्चा में बना हुआ है।  रिसर्च करके उन्‍होंने माना कि यह वही फिरओन है जिसकीकुरआन में भविष्‍यवाणी की गयी थी कि अल्‍लाह इसकी लाश इबरत (Warning) के लिए सलामत रखेगा।

धर्म ग्रंथ के सच्‍चे होने की एक निशानी यह भी होती है कि उसमें कही गयी बातें देर सवेर किसी तरह सच साबित होती हैं जैसे की फिरऔन बादशाह की लाश और कुरआन पर हुई रिसर्च के बाद इसाई दुनिया में तहलका मच गया था, स्‍वयं रिसर्च करने वाला मुसलमान हुआ या नहीं इस बात में शक हो सकता है लेकिन उसके सच बोलना पसंद करने कारण लाखों इसाईयों को इस्‍लाम की तरफ आने का कारण बना इस बात में कोई शक नहीं, फ्रांस जहां कि आज मुसलमानों की जनसंख्‍या दूसरे नंबर है इस रिसर्च के बाद फिर इसी डाक्‍टर कि पुस्‍तक The Bible,The Qur'an & Science से भी इसाई दुनिया इस्‍लाम की ओर आकर्षित हुई थी । इस रिसर्च के बाद इसाई और यहूदियों ने फिरऔन के अंत को अपनी धार्मिक किताबों में बदलना शुरू कर दिया, झूठा इतिहास तैयार करने का सबूत टेंथ कमांडेट फिल्‍म में फिरऔन को डूबता नहीं बल्कि जंग से महल वापस जाता दिखाया गया है।

थोडे थोडे समय बाद कुरआन अपना ईश्‍वरीय कलाम होना साबित करता रहा है जैसे इस लेख में जानेंगे कि फिरऔन का जिस्‍म और रिसर्च करने वाले डाक्‍टर ने सच्‍चाई को समझ कर बाकी जिंदगी कुरआन की सच्‍चाई से दूसरों को अवगत कराने में बिता दी।

मोरिस बुकाय (बोकाइले, Maurice Bucaille)  (जन्म 1920) फ्रेंच चिकित्सक थे, पेरिस  के अस्पताल में सर्जिकल में विशेज्ञ के रूप में काम करते रहे। प्रतिष्ठा का सबसे बडा कारण पुस्तक "बाइबल कुरआन और विज्ञान" है जिसमें आपने यह साबित किया है कि कुरआन की कोई बात वैज्ञानिक दृष्टिकोण के खिलाफ नहीं है, जबकि बाइबल की कई बातें आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों से गलत साबित होती हैं । यह फ्रेंच किताब बहुत लोकप्रिय हुई और कई उर्दू, इंग्लिश सहित कई भाषाओं में अनुवाद किया गया। इस्लामी दुनिया में किताब बहुत लोकप्रिय हुई और इस रिसर्च को  "ब्यूकलीज़म" नाम दिया गया।

फिरऔन की लाश के बाल भी अलगअलग दिखायी देते हैं अगर यह ममी होती तो तमाम हिस्‍से पर मेंहदी की तरह हडिडयों को सलामत रखने वाला मसाला लगा होता। 

Firon Body In France

फ्रांस के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वह पुरातत्व का सबसे अधिक सरपरस्‍ती करने वाला देश है, जिस समय फ्रांस का प्रधान मंत्री फरांसू मीटारान François Mitterrand 1981 में हुआ तो उसने मिस्र से मिस्र के फिरऔन की लाश मांगी ताकि उस पर कुछ चिकित्सा अनुमान Archaeological tests and examinations किया जाये, अतः फिरऔन की लाश फ्रांस लाई गयी और जिस समय यह लाश फ्रांस के हवाई अडडा पर विमान से उतरी तो फ्रांस के प्रधानमंत्री ने उसका इस प्रकार स्वागत किया कि लगता था फिरऔन जिवित है तथा अब भी चीख रहा है कि मैं तुम सबका सब से बडा पालनहार हूं।

अतः शव फ्रांस के पुरातत्व सेन्टर ले जायगा गया ताकि बडे बडे चिकित्सक उसके बारे में गवेषण (रिसर्च) करें तथा अस्त्र चिकित्सकों के प्रधान मोरिस बुकाय थे। गवेषणा में मोरिस बुकाय का ध्यान इस पर था कि यह पता लगाया जाये कि इस फिरऔन का देहांत कैसे हुआ है जबकि दूसरे लोग कुछ और ही गवेषणा कर रहे थे। जांच से पता चला कि यह अर्थात जिसका यह शव है वो रात के अन्तिम समय में (डूब)जलमग्न हो कर मरा है क्यों कि उसके शरीर पर कुछ समुन्द्री नमक का भाग बाकी था। साथ ही साथ यह भी पता चला कि उसकी लाश डूबने के कुछ ही समय बाद निकाली गयी है। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि दूसरी फिरऔनी लाशों के अलावा इसकी लाश केवल इस प्रकार सुरक्षित क्यों बाकी है जब कि सारी लाशें समुंद्र से निकाली गयी हैं?

मोरिस बुकाय सारे गवेषणा (रिसर्च) की प्रतिवेदन (फाइनल रिपोर्ट) लिख रहे थे कि अचानक एक आदमी ने उनके कान में चुपके से कहा कि जल्दी न करो मुसलमान लोगों का कहना है कि वह जलमग्न होकर मरा है। परन्तु मोरिस ने इस सूचना को बिल्कुल नकार दिया तथा आश्चर्य में पड गए कि इस प्रकार का ज्ञान बडी मशीनों से गवेषणा (रिसर्च) करने के बाद ही हो सकता है। फिर उसी आदमी ने कहा कि वह कुरआन जिस पर मुसलमान विश्वास करते हैं उसमें इसके जलमग्न होने तथा इसकी लाश के सुरक्षित रहने का वर्णन आया है। इस से उनका आश्चर्य और ही बढ गया तथा लोगों से पूछने लगे कि यह कैसे हो सकता है? जबकि इस लाश का गवेषणा लगभग दो वर्ष पहले 1898 में हुआ है जबकि उनका कुरआन 1400 सौ सालों पहले से है। यह बात बु़द्धि‍ में कैसे आ सकती है? जब कि केवल अरब ही नहीं बल्कि सारे के सारे मनुष्य कुछ वर्ष पहले मिस्र के पुराने लोग अपने फिरऔनों पर मसाला लगाना जानते हैं। 

मोरिस बुकाय पूरी रात बैठ कर ध्यान पूर्वक अपने मित्र की बात को सोचते रहे कि मुसलमानों के कुरआन में डूबने के बाद इस लाश के बचने का वर्णन आया है। जबकि तौरात में यह है कि फिरऔन उस समय डूबा है जब मूसा को भाग रहा था और इस में उसकी लाश के बारे में कोई चर्चा नहीं है।  अतः मोरिस अपने दिल में कहने लगे कि क्या यह बात बुद्धि में आने वाली है कि यह मेरे सामने जो लाश है यह वही मिस्र का फिरऔन है जिसने मूसा को भगाया है? तथा क्या यह बात बुद्धि में आने वाली है कि मुसलमानों का मुहम्मद सल्‍ल. यह बात एक हजार वर्ष से अधिक पहले जान जाये? और मैं अब जान पाया हूं।

मोरिस सो न सके तथा तौरात मंगाया। और तौरात में पाया कि जल ने फिरऔन की सारी सेना को लपेट लिया और उनमें से कोई न बचा। परन्तु मोरिस को बराबर आश्चर्य रहा कि पूरे तौरात में कहीं भी इसकी लाश के ठीक ठाक बच जाने का वर्णन नहीं मिलता है।

फिरऔन की लाश को चिकित्सा एवं सुधार के बाद फ्रांस ने फिरऔन के वैभव के अनुसार शीशे के ताबूत में भेज दिया। परन्तु मोरिस को उस बात के कारण जो उन्होंने फिरऔन की लाश के बारे में मुसलमानों की ओर से सुना था चैन न आया। इसी कारण सफर की तैयारी करके सउदी अरब में एक चिकित्सा महान सम्मेलन में भाग लेने के लिये गये जिस में बहुत से मुसलमान शव परीक्षा करने वाले भी भग ले रहे थे। वहां पर सबसे पहले मोरिस ने फिरऔन की शव के बारे में जो खोज लगाया था उसी का चर्चा किया। तुरंत एक मुसलमान ने कुरआन खोल कर ईश्वरीय वाणी दिखायाः

 "अतः आज हम तेरे शरीर को बचा लेगें, ताकि तू अपने बादवालों के लिए एक निशानी हो जाए। निश्‍चय ही, बहुत-से लोग हमारी निशानियों के प्रति असावधान ही रहते है।"॥ (कुरआन-10:92)  सुरह यूनुस

So today We will save you in body that you may be to those who succeed you a sign. And indeed, many among the people, of Our signs, are heedless (Quran-10:92)


 कुरआन की इस आयत का मोरिस पर बहुत बडा प्रभाव पडा तथा दिल में इस प्रकार आवेश पैदा हुआ कि सारे लोगों के सामने खडे होकर निसंकोच हो कर घोषणा कर दिया कि मैं ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया तथा इस कुरआन पर विश्वास कर लिया।

मोरिस फ्रांस से वापस आये तथा लगभग दस वर्ष तक बिना किसी दूसरे कार्य के इस रिसर्च में लग गये कि आज के समय के नए वैज्ञानिक सिद्धांत एवं अनुसाधान कुरआन से कितना मेल खाते हैं। ताकि कुरआन की इस आयत का परिणाम उन्हें मिल सके।

 अब ये अत्याचारी जो कुछ कर रहे है, उससे अल्लाह को असावधान न समझो। वह तो इन्हें बस उस दिन तक के लिए टाल रहा है जबकि आँखे फटी की फटी रह जाएँगी, (Quran - 14:42)


कुछ ही वर्षों के बाद मोरिस ने फ्रांस में कुरआन के बारे में एक पुस्तक लिखी जिस से पूरी पश्चमी देश तथा पश्चीमी वैज्ञानिकों को हिला दिया। इस पुस्तक का नाम था ‘‘कुरआन, तौरात, इन्जील एवं ज्ञान नयी मर्म के अनुसार पवित्र पुस्तकों पर गवेषणा -कुरआन और नया चैलेंज-- 

The Bible, The Qur’an and Science… THE HOLY SCRIPTURES EXAMINED IN THE LIGHT

OF MODERN KNOWLEDGE

इस पुस्तक ने क्या किया? जैसे ही पहली बार छपी सारी दुकानों से तुरंत समाप्त हो गयी। फिर फ्रांसिसी भाषा से अरबी, इंग्लिश, इन्डोनेसी, फारसी, तुर्की, उर्दू, गुजराती, अलमानी आदि भाषा में अनुवाद होकर पुनः छापी गयी ताकि पूरब से पश्चिम तक सारे पुस्तकालय में उपलब्ध हो जाये।

यहां यह बात भी याद रहे कि मोरिस की इस पुस्तक पर यहूदी और इसाई धर्म के सारे वैज्ञानिकों ने खण्डन करने तथा उत्तर देने के प्रयास किया परन्तु किसी ने भी कोई ढंग की पुस्तक न लिखी दाये बायें बहुत चक्कर लगाया परन्तु कोई विशेष बात न लिख सके।

इस से आश्चर्य की बात यह है कि अरब इलाके के कुछ इसाई एवं यहूदी वैज्ञानिक ने भी खण्डन करने का प्रयास किया परन्तु जब मोरिस की पुस्तक को ध्यान पूर्वक पढने लगे तो मुसलमान हो गये।

Useful links:>>

डाक्‍टर मोरिस कहते थे "my choice is to tell the truth"
अर्थात मैं सच कहना पसंद करता हूं उनके काम पर आधारित वेबसाइट
http://bucaillelegacy.com/Maurice%20and%20the%20Pharaoh%20&From%20Microcosm%20to%20Macrocosm%20Award.html

 Read More: 

THE QUR’AN AND MODERN SCIENCE

http://www.sultan.org/articles/QScience.html

Dr. Maurice Bucaille and other Scientists' Comments On The Qur'an
http://www.islamic-awareness.org/Quran/Science/scientists.html

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 Firon Body in Egypt Museum
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फिरओन और उस पर डाक्‍टर मोरिस की रिसर्च बारे में समझने के लिए देखें विडिया
https://www.youtube.com/watch?time_continue=202&v=XnwCWDX-stk

xox

"शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्ट हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है" (कुरआन-41:53) http://tanzil.net/#trans/hi.farooq/41:53


उपरोक्‍त कुरआन की बात को जेहन में रखते हुए
फिंगर प्रिंट, कायनात, लोहा, आसमान ,बारिश, बच्‍चो का लिंग और कुरआन में गण्‍ितिय चमत्‍कार आदि विषयों को समझने के लिए देखें लगभग एक घंटे का विडियो
कुरआन के वैज्ञानिक चमत्कार  Scientific Miracles of Qur'an
https://www.youtube.com/watch?v=HOwPnfIDJcE 

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